आज कई हफ़्तों बाद एक दिन सुकून का मिला है....खाली दिन....ऑफिस का कोई झंझट नहीं....काम का कोई तनाव नहीं. नाहीं कहीं किसी से मिलने जाने की जल्दी. मैं और साथ में अपनी रूह, अपनी भावनाएं.
सामान्यतः कवि हृदय इंसान को अकेले छोड़ दीजिये....तो कोई न कोई तोह खिचड़ी पकती है मन में. ऐसी ही एक खिचड़ी नीचे है.
आज सुकून में हूँ तो कोई दर्द या प्रेम वाली बात नहीं करूंगा. आज बात करूंगा आशाओं की, कल्पनाओं की....और उसके उड़ान की ...........तो आप भी उड़िए मेरे साथ इन कल्पनाओं में .....
कल्पना की उड़ान
मंजिलों से भी दूर
आशाओं से परे
जाता है एक सफ़र
बादल के पार
आकाश की उचाईयों तक.
जरूरत है खोलने की
अपने आँखें मन की
और उड़ने दो कल्पनाओं को
उनकी स्वाभाविक उड़ान,
पाओगे तुम की आ गए हो
एक नए संसार में
एक नयी ऊँचाइयों तक.
एक अलग ही दुनिया
अपनी सी, खुद की बनी हुई
उसमे होने का एहसास
छू जायेगा तुम्हे
दिल के गहराइयों तक.
अजेय होने का एहसास
तुम्हे भर देगा खुशी से
और कल्पनों की
उड़ान में होकर शामिल
उड़ने लगोगे तुम भी
नईं ऊँचाइयों तक .
बहुत प्यार...........जीवितेश.
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