Friday, October 22, 2010

Pyaas

प्यास

प्यास !
यह निकम्मी दुनिया
भी प्यासी है.
किसी के रक्त की
किसी के दुखों की
किसी के समृधि की
या फिर पैसों की.
इसकी प्यास कभी मिटटी नहीं
हमेशा सुरसा की तरह
मुंह बाये खड़ी रहती है .

इसकी प्यास बुझाने की
कोशिश करता हूँ तो
लगता है की शायद
मैं भी प्यासा हूँ
अपनी आत्मा के
अंतरतम तक.

लेकिन मेरी प्यास है
इस भाग-दौर की
ज़िन्दगी में थोड़ी सी
शांति की, स्थिरता की .

मैं दौड़ता रहता हूँ उसके पीछे,
दौड़ रहा हूँ.........
कंठ सूखता है
आँखें अँधेरी हो जाती है
लेकिन प्यास बनी रहती है
बुझती नहीं..
एक शास्वत सत्य की तरह..
प्यास !

बहुत प्यार........जीवितेश

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