जब से यह ब्लॉग शुरू किया है, यार दोस्त कह रहे हैं...अमां यार जवान कवि हो....गाडी को जरा प्रेम रस की पटरी पे दौडाओ. इसलिए आज सोच रहा हूँ की .....भागलपुर एक्सप्रेस को दौडाएं ..प्रेम की पटरी पे. बस एक डर है की कहीं एक्सिडेंट न हो जाये..... :-)
सिर्फ तुम्हारे लिए
सिले सिले होंठों से
कैसे कहूं की मैं तुम्हे चाहता हूँ.
मुंदी मुंदी आँखों से
कैसे बोलूँ की तुम कितनी सुंदर हो.
बंधे बंधे हाथों से
तुम्हे कैसे बाँधू
की तुम वही सब्ज्परी हो
जो मेरे सपनों में
हर पूर्णिमा की रात
चांदनी के रथ पर
आकाश से उतरती हो.
रुके रुके पावों से
तुम्हे कैसे रोकूँ
क्यूंकि तुम नदी की तरह
मेरे बगल से रोज़ बहती हो.
सिर्फ खुला है
मेरे ह्रदय का कपाट
झाँक कर देखो,
तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए !
बहुत प्यार......जीवितेश !
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