आज कई हफ़्तों बाद एक दिन सुकून का मिला है....खाली दिन....ऑफिस का कोई झंझट नहीं....काम का कोई तनाव नहीं. नाहीं कहीं किसी से मिलने जाने की जल्दी. मैं और साथ में अपनी रूह, अपनी भावनाएं.
सामान्यतः कवि हृदय इंसान को अकेले छोड़ दीजिये....तो कोई न कोई तोह खिचड़ी पकती है मन में. ऐसी ही एक खिचड़ी नीचे है.
आज सुकून में हूँ तो कोई दर्द या प्रेम वाली बात नहीं करूंगा. आज बात करूंगा आशाओं की, कल्पनाओं की....और उसके उड़ान की ...........तो आप भी उड़िए मेरे साथ इन कल्पनाओं में .....
कल्पना की उड़ान
मंजिलों से भी दूर
आशाओं से परे
जाता है एक सफ़र
बादल के पार
आकाश की उचाईयों तक.
जरूरत है खोलने की
अपने आँखें मन की
और उड़ने दो कल्पनाओं को
उनकी स्वाभाविक उड़ान,
पाओगे तुम की आ गए हो
एक नए संसार में
एक नयी ऊँचाइयों तक.
एक अलग ही दुनिया
अपनी सी, खुद की बनी हुई
उसमे होने का एहसास
छू जायेगा तुम्हे
दिल के गहराइयों तक.
अजेय होने का एहसास
तुम्हे भर देगा खुशी से
और कल्पनों की
उड़ान में होकर शामिल
उड़ने लगोगे तुम भी
नईं ऊँचाइयों तक .
बहुत प्यार...........जीवितेश.
Saturday, October 30, 2010
Sunday, October 24, 2010
Sirf Tumhare Liye
जब से यह ब्लॉग शुरू किया है, यार दोस्त कह रहे हैं...अमां यार जवान कवि हो....गाडी को जरा प्रेम रस की पटरी पे दौडाओ. इसलिए आज सोच रहा हूँ की .....भागलपुर एक्सप्रेस को दौडाएं ..प्रेम की पटरी पे. बस एक डर है की कहीं एक्सिडेंट न हो जाये..... :-)
सिर्फ तुम्हारे लिए
सिले सिले होंठों से
कैसे कहूं की मैं तुम्हे चाहता हूँ.
मुंदी मुंदी आँखों से
कैसे बोलूँ की तुम कितनी सुंदर हो.
बंधे बंधे हाथों से
तुम्हे कैसे बाँधू
की तुम वही सब्ज्परी हो
जो मेरे सपनों में
हर पूर्णिमा की रात
चांदनी के रथ पर
आकाश से उतरती हो.
रुके रुके पावों से
तुम्हे कैसे रोकूँ
क्यूंकि तुम नदी की तरह
मेरे बगल से रोज़ बहती हो.
सिर्फ खुला है
मेरे ह्रदय का कपाट
झाँक कर देखो,
तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए !
बहुत प्यार......जीवितेश !
सिर्फ तुम्हारे लिए
सिले सिले होंठों से
कैसे कहूं की मैं तुम्हे चाहता हूँ.
मुंदी मुंदी आँखों से
कैसे बोलूँ की तुम कितनी सुंदर हो.
बंधे बंधे हाथों से
तुम्हे कैसे बाँधू
की तुम वही सब्ज्परी हो
जो मेरे सपनों में
हर पूर्णिमा की रात
चांदनी के रथ पर
आकाश से उतरती हो.
रुके रुके पावों से
तुम्हे कैसे रोकूँ
क्यूंकि तुम नदी की तरह
मेरे बगल से रोज़ बहती हो.
सिर्फ खुला है
मेरे ह्रदय का कपाट
झाँक कर देखो,
तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए !
बहुत प्यार......जीवितेश !
Friday, October 22, 2010
Pyaas
प्यास
प्यास !
यह निकम्मी दुनिया
भी प्यासी है.
किसी के रक्त की
किसी के दुखों की
किसी के समृधि की
या फिर पैसों की.
इसकी प्यास कभी मिटटी नहीं
हमेशा सुरसा की तरह
मुंह बाये खड़ी रहती है .
इसकी प्यास बुझाने की
कोशिश करता हूँ तो
लगता है की शायद
मैं भी प्यासा हूँ
अपनी आत्मा के
अंतरतम तक.
लेकिन मेरी प्यास है
इस भाग-दौर की
ज़िन्दगी में थोड़ी सी
शांति की, स्थिरता की .
मैं दौड़ता रहता हूँ उसके पीछे,
दौड़ रहा हूँ.........
कंठ सूखता है
आँखें अँधेरी हो जाती है
लेकिन प्यास बनी रहती है
बुझती नहीं..
एक शास्वत सत्य की तरह..
प्यास !
बहुत प्यार........जीवितेश
प्यास !
यह निकम्मी दुनिया
भी प्यासी है.
किसी के रक्त की
किसी के दुखों की
किसी के समृधि की
या फिर पैसों की.
इसकी प्यास कभी मिटटी नहीं
हमेशा सुरसा की तरह
मुंह बाये खड़ी रहती है .
इसकी प्यास बुझाने की
कोशिश करता हूँ तो
लगता है की शायद
मैं भी प्यासा हूँ
अपनी आत्मा के
अंतरतम तक.
लेकिन मेरी प्यास है
इस भाग-दौर की
ज़िन्दगी में थोड़ी सी
शांति की, स्थिरता की .
मैं दौड़ता रहता हूँ उसके पीछे,
दौड़ रहा हूँ.........
कंठ सूखता है
आँखें अँधेरी हो जाती है
लेकिन प्यास बनी रहती है
बुझती नहीं..
एक शास्वत सत्य की तरह..
प्यास !
बहुत प्यार........जीवितेश
Sunday, October 17, 2010
Dosti Aaj Kal...
आज का दिन मेरे जिंदगी में बहुत खास है. कुछ ऐसे लोगों से मिला जो मेरी जिंदगी में काफी अहमियत रखते हैं. जिनके न होने से जिंदगी खाली हो जाता है. हालाँकि ...खालीपन भी हमेशा बुरा नहीं होता....कई बार बहुत कुछ सोचने का मौका देता है. अपने आप को समझने का मौका देता है. खैर....आज की मेरी कविता ...मेरे अकेलेपन पर...आपके नज़र करता हूँ...बहुत ही बेसुरी कविता है ...लेकिन मेरे दिल के करीब है....कृपया झेल लीजियेगा :-)
सच्चा साथी
यह तन्हाई और अकेलापन
कितना अच्छा है....हमेशा
साथ रहता है कभी छोरता
नहीं....एक सच्चे साथी की तरह.
दुःख में, सुख में .. हर घडी
में, नितांत अकेलापन कभी
कचोटता लेकिन आज तो यह
मेरी ज़रुरत बन गया है
शायद....मेरी जिंदगी की तरह.
सभी छोड़ जायेंगे एक दिन,
इसलिए किस ने साथ नहीं
दिया, यही दर्द पहले सालता
रहता था....घाव में
उभरे हुए तीस की तरह.
लेकिन अब तो यह आदत
बन गयी है....एक ज़रुरत
शायद नींद की गोली की तरह.
हमेशा सोचता रहता हूँ
यह अकेलापन ही अच्छा साथी
है, सच्चा साथी है.....
सबसे सच्चा साथी...
बहुत प्यार....जीवितेश
सच्चा साथी
यह तन्हाई और अकेलापन
कितना अच्छा है....हमेशा
साथ रहता है कभी छोरता
नहीं....एक सच्चे साथी की तरह.
दुःख में, सुख में .. हर घडी
में, नितांत अकेलापन कभी
कचोटता लेकिन आज तो यह
मेरी ज़रुरत बन गया है
शायद....मेरी जिंदगी की तरह.
सभी छोड़ जायेंगे एक दिन,
इसलिए किस ने साथ नहीं
दिया, यही दर्द पहले सालता
रहता था....घाव में
उभरे हुए तीस की तरह.
लेकिन अब तो यह आदत
बन गयी है....एक ज़रुरत
शायद नींद की गोली की तरह.
हमेशा सोचता रहता हूँ
यह अकेलापन ही अच्छा साथी
है, सच्चा साथी है.....
सबसे सच्चा साथी...
बहुत प्यार....जीवितेश
Saturday, October 16, 2010
Pehla Ahsaas
इंसान की जिंदगी में हर पहली चीज़ बहुत प्यारी होती है। चाहे वोह पहली सांस हो...पहली बार चलना हो ....स्कूल का पहला दिन..पहली साइकिल ...कॉलेज का पहला दिन...हर चीज़। यह मेरी पहली पोस्ट है......अतः मेरे लिए काफी विशेष है। लेकिन सोचता हूँ......क्या लिखूं......अपने बारे में ...ना...एक तकनीकी संस्थान में काम करने वाली की जिंदगी के बारे में लिखे ने के लिए कुछ ख़ास नहीं होता....तोह...फिर बिहार के बारे में लिखूं......मन करता है ...लेकिन यह सोच कर चुप रहता हूँ की......बहुत से लोग हैं जो बहुत ज्यादा अच्छा लिखते हैं...बिहार के बारे में ...मन उद्वेलित हो जाता है पढके ऐसा लिखते हैं। चाहे वोह रंजन सर की दालान हो या रविश बाबु की क़स्बा।
सो.....सोचता हूँ...सोचता रहता हूँ......हाँ एक चीज़े है......जो मैं यहाँ लिख सकता हूँ...वोह है.....अपनी ढेर साड़ी कवितायेँ......उनमे से कुछ तो पोस्ट करूंगा......लेकिन ..पहले .....अपने गुरूजी की आज्ञा ले लूं।
गुरूजी इस दुनिया में मुखियाजी के नाम से जाने जाते हैं और अभी पाटलिपुत्र की यात्रा पे हैं।
तो मिलते हैं शीघ्र ही आपसे....हमारी बात करने.........
सो.....सोचता हूँ...सोचता रहता हूँ......हाँ एक चीज़े है......जो मैं यहाँ लिख सकता हूँ...वोह है.....अपनी ढेर साड़ी कवितायेँ......उनमे से कुछ तो पोस्ट करूंगा......लेकिन ..पहले .....अपने गुरूजी की आज्ञा ले लूं।
गुरूजी इस दुनिया में मुखियाजी के नाम से जाने जाते हैं और अभी पाटलिपुत्र की यात्रा पे हैं।
तो मिलते हैं शीघ्र ही आपसे....हमारी बात करने.........
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