Tuesday, February 17, 2015

बसंत

शीतल समीर के झोंके से
झूम उठी बेलें, बिहस पड़ी,
कलियाँ, भंवरे गुनगुनाने लगे
मानो ! बसंत आ गया !

आम्र मंजरियों के सुगंध से
बौराये हुए होंठों पर,
कुछ गीत थिरकने लगे
मानो ! बसंत आ गया !

दुल्हन सी सजी धरती
पलाश के रक्ताभ फूलों से,
प्रेयसि की तरह सजने लगी
मानो ! बसंत आ गया !

सरसों के सुनहरे आँचल में
रंग-बिरंगी तितलियों की,
पंखों की फरफराहट कहने लगी
कि सचमुच में बसंत आ गया !

बहुत प्यार, जीवितेश 

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